मैं तहज़ीबो-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूँगा ?

“जिस नुक्स को मेरे नाम से मंसूब किया (जोड़ा जाता) है, दरअसल मौजूदा निज़ाम का नुक़्स है—मैं हंगामापसंद नहीं। मैं लोगों के खयालातो-जज़्बात में हैजान (उबाल) पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहज़ीबो-तमद्दुन की और सोसाइटी की चोली क्या उतारूँगा जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं, दर्जियों का है। लोग मुझे सियाह-क़लम कहते हैं, लेकिन मैं तख्ता-ए-सियाह पर काली चाक से नहीं लिखता, सफेद चाक इस्तेमाल करता हूँ कि तख्ता-ए-सियाह की सियाही और-भी ज़्यादा नुमायाँ हो जाए।” (मंटो)

एक तस्वीर देखा जिसमे भगवा गिरोह के कुछ लोग प्रदर्शन कर रहे थे , उनकी एक तख़्ती पर लिखा था “प्यार करो मगर अपने संस्कृति के अनुसार”… बेटी -बहन के प्यार, उनकी इच्छाओं, उनकी कामेच्छाओं को अपनी मुट्ठी में जकड कर इसे अपनी इज्जत का तमगा बना देने वाला घोर मर्दवादी, जातिवादी समाज भला किस मुंह से प्यार के बारे में कोई नसीहत दे सकता है ? हमें भी इस हिंसक -असभ्य संस्कृति के नंगई को रोज -रोज बयान करने का मन नहीं करता है , मगर उकसाने वाले जब हीप्पोक्रेसी पर उतर जाएँ तो क्या किया जाये ?
Romance-in-Rome-kissing-on-the-steps

संस्कृति के स्वयंसेवक झंडावरदारों के गुंडई और मोरल पोलिसिंग के खिलाफ शुरू हुए सांकेतिक आंदोलन के विरोधी कुछ प्रतिक्रियावादियों का तर्क है कि चुकि इस आंदोलन को बहुसंख्यक लोगों का समर्थन नहीं प्राप्त है, इसलिए इसे आंदोलन कहना गलत है वगेरह वगेरह …. किसी भी सामाजिक कुप्रथा का समर्थन यहीं बहुसंख्यक जनता करती है, उसको प्रश्रय देती है , उसकी रक्षा करती है और उसके दुष्परिणामों को भुगतती है …उठा कर देख लीजिये इतिहास … विरोध की आवाज शुरू में हमेशा संख्या के लिहाज से कम मगर असर के लिहाज से जोरदार होती रही है … असर पर तो आप लोंगो को कोई संदेह नहीं ही होना चाहिए , ऐसे ही थोड़ी बिलबिला रहें हैं झोलाछाप नैतिकता के बजरंगी पहरेदार। ।
(तस्वीर साभार : गूगल इमेज सर्च)

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